कुछ शांत पलों की पंकितयां। मेरी ओर से 

भूल के गमोंं को आगे बढ़ना है चल
ज़मीन से उठकर आकाश को चूना है चल
मुश्किलें तो दुनिया की सच्चाई है मेरे दोस्त
रात के अंधेरों को छोड़ उजाले साथ लेकर चल

ज़िन्दगी सुहाना है सफर , मिलती है एक बार
रोना है या हसना है , करना है ये ऐतबार
उम्मीदों की ऊँगली थम , निकल चले इस सफर में
राहों की फैली चाद्दर को महसूस करते चल

प्यार रूह है ज़िन्दगी की , जोड़ें हम,हमें खुदी से
एक जलती लॉ है, जो जले तन में हर पल
एक अपना हो हमेशा साथ , कल आज और कल
इस उगते सूरज के संग , ढूंढने निकले उस मंज़िल को चल…holidays-32a

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होली जो थी समय के पार

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आज के वक़्त  वाट्सएप्प मैसेज और डीजे के बीट्स पर थिरकते हुए होली मानाने के बीच में हमारे अपने बचपन की होली गम सी गयी है. बचपन के होली का अलग  ही मज़ा था। एक हफ्ते ;पहले से ही होली की तयारियां शुरू हो जाती थी।  पिचकारिय चल रही है की नहीं , गुलाल कौन कौन सा आया , आज के वक़्त में  वाट्सएप्प मैसेज और डीजे के बीट्स पर थिरकते हुए होली मानाने के बीच में हमारे अपने बचपन की होली गुम  सी गयी है. बचपन के होली का अलग  ही मज़ा था। एक हफ्ते पहले से ही होली की तयारियां शुरू हो जाती थी।  पिचकारिय चल रही है की नहीं , गुलाल कौन कौन सा आया , रंग पक्के तो है न? और जाने क्या क्या।  पानी  की होली तो पिचकारियां चेक करने के बहाने हफ्ते भर पहले  शुरू हो जाया करती थी।  पूरे  आँगन  में पानी  मारते  रहते  थे एक दुसरे पर।  शाम में होलिका जली की , हमारी होली शुरू..  पानी वाली तो  नहीं खेल पाते  पर हाँ सूखे रंगों से सबको खूब दौड़ते थे. बस कोई सामने दिख जाये, उस की तो फिर खेर नहीं।

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होली की दिन मम्मी को हमें उठाने  की ज़हमत नहीं  उठानी पड़ती थी।  दबे पाँव घर के बहार भाग ही रहे होते की माँ दरवाज़े पर ही रोक देती। फिर तो ‘ ढंग से नाश्ता  करो, फिर ही खेलने जाने मिलेगा’ फरमान सुना दिया जाता था. राकेट की स्पीड से थोड़ा बहुत निगलते और मम्मी के हिदायतें सुनते सुनते भाग जाते।  ” पुरे शरीर पर ढंग से तेल मल  लो नहीं तो रंग नहीं छूटेगा , ध्यान से खेलना , बदमाशी मत करना , जल्दी वापस आना, हार्मफुल रंगों  से बच के रहना ।  और जाने क्या क्या।  मम्मी के यह निर्देश गली के मोड़ तक  सुनाई  देते। एक बार घर की चारदीवारी से निकले नहीं की हमारी पूरी हुड़दंग शुरू  हो जाती।  बस टोली जमा की और चल पड़े। उस समय का जमाना भी अलग था. कोई औपचारिकता नहीं होती थी। आस पड़ोस के बच्चे हमारे पक्के दोस्त हुआ करते थे एक साथ बदमाशियां करते और उसकी डांट  भी खाते।  सड़कों पर जा रहे राहगीरों को रंगों से भीगना  तो आम बात होती   थी।  हम तो जानवरों को भी न छोड़ते थे, आखिर होली का दिन था भई।  शाम में थक हार के घर लौटते , और फिर मम्मी  पीछे पड़ जाती, हमारे नीले पीले रंगों को छुड़ाने में. उस रात सबसे अछि नींद आती।

आज तो त्योहारों के मायने ही बदल गए है।  अब क्लब के एंट्री पास के लिए   पैसे देकर और  डीजे और भांग की  धुन पर नाचना ही होली हो गयी है. आज यह सब याद कर के आँखें नाम सी हो जाती है। बड़े बड़े घरों और कांच के बक्से जैसे ऑफिस में बैठ कर होली एक और संडे  लगने  लगा है।  न ही वो रंग बिरंगी पिचकारियां है  न ही उनमे से छलकने वाले प्यार, दोस्ती और खुसी के रंग।  अब तो होली वो होली न रही।  खैर जाने दीजिये।बचपन की होली याद कीजिये और अभी होली का भी मज़ा उठाइए।    आप सभी को होली की बहुत शुभकामनाये। धुन पर नाचना ही होली हो गयी है. आज यह सब याद कर के आँखें नाम सी हो जाती है। बड़े बड़े घरों और कांच के बक्से जैसे ऑफिस में बैठ कर होली एक और संडे  लगने  लगा है।  न ही वो रंग बिरंगी पिचकारियां है  न ही उनमे से छलकने वाले प्यार, दोस्ती और खुसी के रंग।  अब तो होली वो होली न रही. खैर जाने दीजिये।  आप सभी को होली की बहुत शुभकामनाये।

You can do it!

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In a small village there were two friends. One of them was a 6 year old boy whereas the other was 10 years old. There were the best of friends and did everything together. Going to school together and playing together, eating, laughing, enjoying together. The whole village knew of their friendship. One day they both went to an open space to fly kites. Slowly they wandered farther away from the village where there was no one to be seen. Suddenly the elder boy fell into a deep pit and started crying for help. The smaller one wandered around to get some help, but failed to do so. And then He decided to help the boy himself. He found a rope and pulled the older boy up.

When the kids reached their home they told the villagers about the incident. But no one was ready to believe that a small boy could lift up someone who is double his weight. They failed in convincing them that it was actually the truth. Although there was an old man who believed them. The villagers respected this old man and  believed him but asked him as how could be that  possible.

The old man replied that the younger boy could hoist the elder one up from the pit only because there was no one to tell him that he could not do that. There was no one to discourage him; not even himself.

Everything that we go through is in our mind. If we decide to do something, there is no one who can stop us from completing our work. It is all in our hands and in our determination to do something which we wish to.

everyone is equipped with same amount of will, strength and determination. the requirement is only to recognize it and use it in our needs..

Good Luck !

A Thing called auto Rickshaw

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A three wheeler Samaritan of the masses, rickshaws are the lifeline of today’s cities. In a scenario where inflation is at its peak and petrol prices are competing with gold to reach at the top of the most expensive product, autos are the only hope for the non car owners. People have no option for autos as Buses which are mostly overcrowded are difficult to commute in ours is a fast faced life  and at this way of life .Where each inch of the rods are packed with vehicles auto rickshaws are the saviors. These miraculous 3 wheeler have an uncanny ability to swerve through narrow streets and congested lanes. Whatever be the situation. This no bone like flexibility of the rickshaw steering through leaves you amazed at the speed it can twist and turn to push in the rickshaw in to the traffic. You just cannot miss the pinching yourself when you feel that the wheel is just about to fall into a ditch and the other second viola! The rickshaw is again racing on the roads. A rickshaw undoubtedly gives tough competition to the other motor vehicles with its speed and radius. It is the mode of livelihood for the hundreds of rickshaw drivers around. You extend a hand out and here comes an auto. Sometimes or rather most of the time Rickshaws are annoying too; for their careless driving and unattended meters. And that’s why car owners hate them. Sudden halt and unpredictable turns on roads are their trademark. Which makes us curse under our breath every time it makes us jolt in our vehicles behind due to its habit. How much you hate or dislike rickshaws , these are amazing inventions and like god send help when your car breaks down in the middle of the rain or when you have to catch a train. This yellow black Samaritan never puts you down.

हवा के झोकें

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हवा के झोकों से खुली यादों की खिड़कियां कुछ अलग  ही दास्ताँ बयां करती है।  बीते हुए पलों के पन्नों ऐसे खोल जाती है की आप उनमे भीगे बिना  नहीं रह पाते।  उस हवा  के झोकों के संग अठखेलियां करती हुई वो   यादें और एहसास इंसान को उसी समय में खीच कर ले जाती है जिन्हे वह जी कर बाहर  आया है. ऐसा समय जो कभी वापस नहीं  आएगा यह सोच कर आगे बढ़ गया हो।  पर यह कम्बखत हवाएँ  उन यादों को झोखों में पिरोये  सामने ला कर खड़ा कर देती है , बिलकुल कल की ही तरह।  इन यादों में एक गजब की शक्ति होती है।  उस पल  की खुशबू , आपके आसपास के  लोग  , वो हालात , वो समय  , आसपास की हलचल , आवाज़ें जैसे सब कुछ दुबारा जीवंत हो जाती है।  उस पल में किया हुआ इंतज़ार , वो प्यार के पल, वो घडी की सूइयां , वो एहसास , वो जीवन का पड़ाव और वही हम।  अदभुत।  कई बार वो हवा  के झोकें  हमे हमारे सुनहरे कल वापस दे जाते हुए एक मीठी सी मुस्कान का अनूठा तोहफा दे जाते है और कई बार वही झोकें दूसरे कल की याद दिलाते हुए अपने वर्तमान को चाहने की संजाइश  दे जाते है।