होली जो थी समय के पार

images (1)images (3)

आज के वक़्त  वाट्सएप्प मैसेज और डीजे के बीट्स पर थिरकते हुए होली मानाने के बीच में हमारे अपने बचपन की होली गम सी गयी है. बचपन के होली का अलग  ही मज़ा था। एक हफ्ते ;पहले से ही होली की तयारियां शुरू हो जाती थी।  पिचकारिय चल रही है की नहीं , गुलाल कौन कौन सा आया , आज के वक़्त में  वाट्सएप्प मैसेज और डीजे के बीट्स पर थिरकते हुए होली मानाने के बीच में हमारे अपने बचपन की होली गुम  सी गयी है. बचपन के होली का अलग  ही मज़ा था। एक हफ्ते पहले से ही होली की तयारियां शुरू हो जाती थी।  पिचकारिय चल रही है की नहीं , गुलाल कौन कौन सा आया , रंग पक्के तो है न? और जाने क्या क्या।  पानी  की होली तो पिचकारियां चेक करने के बहाने हफ्ते भर पहले  शुरू हो जाया करती थी।  पूरे  आँगन  में पानी  मारते  रहते  थे एक दुसरे पर।  शाम में होलिका जली की , हमारी होली शुरू..  पानी वाली तो  नहीं खेल पाते  पर हाँ सूखे रंगों से सबको खूब दौड़ते थे. बस कोई सामने दिख जाये, उस की तो फिर खेर नहीं।

imagesimages (2)

होली की दिन मम्मी को हमें उठाने  की ज़हमत नहीं  उठानी पड़ती थी।  दबे पाँव घर के बहार भाग ही रहे होते की माँ दरवाज़े पर ही रोक देती। फिर तो ‘ ढंग से नाश्ता  करो, फिर ही खेलने जाने मिलेगा’ फरमान सुना दिया जाता था. राकेट की स्पीड से थोड़ा बहुत निगलते और मम्मी के हिदायतें सुनते सुनते भाग जाते।  ” पुरे शरीर पर ढंग से तेल मल  लो नहीं तो रंग नहीं छूटेगा , ध्यान से खेलना , बदमाशी मत करना , जल्दी वापस आना, हार्मफुल रंगों  से बच के रहना ।  और जाने क्या क्या।  मम्मी के यह निर्देश गली के मोड़ तक  सुनाई  देते। एक बार घर की चारदीवारी से निकले नहीं की हमारी पूरी हुड़दंग शुरू  हो जाती।  बस टोली जमा की और चल पड़े। उस समय का जमाना भी अलग था. कोई औपचारिकता नहीं होती थी। आस पड़ोस के बच्चे हमारे पक्के दोस्त हुआ करते थे एक साथ बदमाशियां करते और उसकी डांट  भी खाते।  सड़कों पर जा रहे राहगीरों को रंगों से भीगना  तो आम बात होती   थी।  हम तो जानवरों को भी न छोड़ते थे, आखिर होली का दिन था भई।  शाम में थक हार के घर लौटते , और फिर मम्मी  पीछे पड़ जाती, हमारे नीले पीले रंगों को छुड़ाने में. उस रात सबसे अछि नींद आती।

आज तो त्योहारों के मायने ही बदल गए है।  अब क्लब के एंट्री पास के लिए   पैसे देकर और  डीजे और भांग की  धुन पर नाचना ही होली हो गयी है. आज यह सब याद कर के आँखें नाम सी हो जाती है। बड़े बड़े घरों और कांच के बक्से जैसे ऑफिस में बैठ कर होली एक और संडे  लगने  लगा है।  न ही वो रंग बिरंगी पिचकारियां है  न ही उनमे से छलकने वाले प्यार, दोस्ती और खुसी के रंग।  अब तो होली वो होली न रही।  खैर जाने दीजिये।बचपन की होली याद कीजिये और अभी होली का भी मज़ा उठाइए।    आप सभी को होली की बहुत शुभकामनाये। धुन पर नाचना ही होली हो गयी है. आज यह सब याद कर के आँखें नाम सी हो जाती है। बड़े बड़े घरों और कांच के बक्से जैसे ऑफिस में बैठ कर होली एक और संडे  लगने  लगा है।  न ही वो रंग बिरंगी पिचकारियां है  न ही उनमे से छलकने वाले प्यार, दोस्ती और खुसी के रंग।  अब तो होली वो होली न रही. खैर जाने दीजिये।  आप सभी को होली की बहुत शुभकामनाये।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Create a free website or blog at WordPress.com.

Up ↑

%d bloggers like this: