खुद से मिल आउ कभी

बरसों से ख्वाइश है, खुद से मिल आऊ कभी
दुनिया की तो सुनती ही रहती हूं
दौड़ के चल दूं दिल की ओर
वह आवाज़ लगाये तभी

आशा की निगाहों से ढूंढती हूं मंज़िल को
क्या पता उससे पूंछू तो
वह ही बता दे उन्हें पाने के रास्ते सभी

चाहता है हमेशा से कुछ कहना वो
पर आवाज़ रहती है उसकी कुछ दबी दबी
सोचती हूँ थोड़ा सुन लू उसकी भी
अब गुफ़्तुगू कर ही आऊ उससे भी

बंद कमरे की चारदीवारी में
कुछ घुट सा जाता है मन
तोड़ के बढ़ियों को, छोड़ के बंदिशों को
खुल के जी आऊ कुछ पल मैं भी।

कुछ परेशानियां, कुछ ज़िम्मेदारियाँ हमेशा ही रहेंगी ज़िन्दगी में,
एक पल को उन्हें भूल कर
ज़िन्दगी के तोहफे को चूम आऊ कभी।

कल तो था, और कल तो हमेशा ही आएगा,
जो आज है उसे पहचान कर, मुस्कुराऊँ अभी

बरसों से ख्वाइश है
खुद से मिल आऊ कभी
दुनिया की तो सुनती ही रहती हूं
दिल की आवाज़ भी सुन आऊ अभी।

Advertisements

5 Comments Add yours

  1. Rohit Nag says:

    Profound,words…..awesome post

    1. Thank you so much. I appreciate
      that u read it 🙂

    2. Thanks….plz do read the rest and give your feedback.

  2. NASIM says:

    Awesome,👌👌👌

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s